Saturday, May 21, 2022
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    आक्रोशित छात्रों ने सरकार से कहा- “बेरोज़गार हैं, लेकिन पेट पर लात मारियेगा तो सरकार बदल देंगे”

    “छात्र हैं, बेरोजगार हैं,लेकिन पेट पर लात मत मारिए,पेट का लात बहुत खराब होता है,अराजकता गलत है, लेकिन आप छात्र को उकसा रहे हैं।नीयत बदलना होगा,नहीं तो सरकार बदल देंगे।घर पर मम्मी बीमार रहती हैं,इलाज में खर्च ना करके हम लोग को भेजती है।रेलवे जॉब की सबसे बड़ी सेक्टर है आप उसी को बेच रहे तो युवा कहां जाएगा? प्रधानमंत्री और रेल मंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए।

    14 जनवरी को रिजल्ट आया और 24 जनवरी तक हमने डिजिटल प्रोटेस्ट किया।9 मिलियन से ऊपर तक ट्वीट किया गया,लेकिन सरकार ने हैशटैग बंद करा दिया। 24 जनवरी को हमने राजेंद्र नगर टर्मिनल पर प्रोटेस्ट शुरू किया। किसी छात्र ने एक पत्थर नहीं चलाया,लेकिन आपकी पुलिस ने उसे बहुत मारा। आपके पास गोली है,मार दीजिए, हम क्या कर सकते हैं।”

    यह बात हम नहीं बल्कि एक छात्र कह रहा है।जो छात्र कल का भविष्य है वह आज सड़कों पर पुलिस से मार खा रहा है। क्यों मार खा रहा है? क्योंकि सरकार तानाशाह है,सरकार को ना तो बेरोजगार युवा दिखते हैं और ना उनकी परेशानी।
    बीबीसी न्यूज़ को दिए गए इंटरव्यू में एक छात्र ने अपने स्ट्रगल को बताया। दरअसल वह स्ट्रगल सिर्फ उसका नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों छात्रों का स्ट्रगल है। जिसे वह आम जीवन में रुबरु होते हैं। जब वह छात्र अपने घर को छोड़ बाहर पढ़ने जाते हैं तो उनके पास हजारों समस्याएं होती हैं। रात को उन्हें भरपेट खाना मिलेगा कि नहीं यह भी नहीं पता होता है।
    और अगर महीने के अंत तक उनके पास पैसे खत्म हो जाते हैं तो उन्हें अपने घर वालों से पैसे मांगने में भी शर्म आती है। क्योंकि वह जानते हैं कि उनके मां-बाप कहीं ना कहीं से कर्ज लेकर या ज़मीन बेचकर पैसे भेजेंगे। मां-बाप भले बीमार हो लेकिन अपना इलाज न करा के पैसे बाहर पढ़ रहे अपने बच्चों को भेजते हैं। ताकि उनका बच्चा पढ़ सके और नौकरी कर सके।

    लेकिन बाहर जिस नौकरी के लिए छात्र पढ़ते हैं उसकी परीक्षा 3-3 साल तक नहीं ली जाती है। परीक्षा कराने के लिए वह हर माध्यम से प्रोटेस्ट करते हैं।परीक्षा होने के बाद रिजल्ट जारी कराने के लिए प्रोटेस्ट करते हैं। और अंत में रिजल्ट जारी में हुई धांधली को लेकर प्रोटेस्ट करते हैं। इतना सब करने और सहने के बाद भी छात्र ही पुलिसिया दमन की शिकार होते हैं।

    सरकार को इतनी समझ होनी चाहिए कि अगर ग्रुप डी जैसे एग्जाम में 1.27 करोड़ छात्र फॉर्म भर रहे हैं तो इस देश में कितनी बेरोजगारी है। माना कि आप किसी संस्था की रिपोर्ट को नहीं मानते, लेकिन आपकी आंखों के सामने चल रही चीजों को तो नजरअंदाज मत कीजिए। आप पकोड़े तलने को भी रोज़गार कहते हैं। ठीक है, आपको कोई बुराई नहीं दिखती है, लेकिन जिन बेरोजगार छात्रों के मां-बाप खुद की बुनियादी चीजों पर खर्च ना करके बाहर अपने बच्चों को पैसे भेजते हैं वो बेरोजगार छात्र कैसे पकोड़े तले?क्या पकौड़े तलने के लिए ही उनके मां-बाप ने स्ट्रगल करके उन्हें पैसे भेजे थे?

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    Shruti Bhardwaj
    Journalist, who loves to write only Political news. Love Satire. Keen Observer and a good orator.

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