Wednesday, November 30, 2022
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    Opinion: गुंडों की जुटान को धर्म संसद कहा जाता है तो आपकी आस्था को चोट नहीं पहुँचती?

    एक धर्म संसद शिकागो में हुई थी। रामकृष्ण परमहंस के शिष्य युवा विवेकानंद ने जब भाइयों और बहनों से शुरुआत की तो यह सिर्फ़ सम्बोधन का बदलाव नहीं था। वसुधैव कुटुम्बकम के नारे का उद्घोष था जिसने लेडीज़ एंड जेंटलमैन के पराएपन को भाइयों और बहनों के कुटुम्ब में बदल दिया।

    128 साल पहले 11 सितंबर 1893 के दिन, स्वामी विवेकानंद ने कहा था — “मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूँ, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया । ” “मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी।”

    शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद / GETTY IMAGES

    यह विश्व के सम्मुख अपने धर्म के मानवतावादी स्वरूप का उद्घोष था जिसने उस अनजान सन्यासी को अकल्पनीय सम्मान और प्रसिद्धि दिलवाई। जिस दौर में औपनिवेशिका सरकार हिंदू धर्म को बर्बर कहकर बदनाम कर रही थी, उन्होंने नैरेशन बदल दिया।

    लौटकर आने के बाद उन्हें जातिप्रथा जैसे अमानवीय विचार से टकराना पड़ा और एक बराबरी के स्वप्न की तरफ़ बढ़े वह। यही धर्म की राह है अगर धारय: इति धर्म: को स्वीकार करें। कमियों को दूर करते हुए उस राह की ओर बढ़ना, जो उचित हो न्यायपूर्ण हो।

    इसके ठीक विपरीत धर्म जब राजनीति जा ग़ुलाम हो जाता है तो हरिद्वार जैसी अधर्म संसद होती है जहाँ हथियार उठाने की अपील की जाती है। जहाँ अपने ही पड़ोसियों को दुश्मन बनाया जाता है। जहाँ अपने ही देश को नफ़रत के ख़ूनी हाथों में सौंपने की तैयारी चलती है। जहाँ जो कुछ बुरा है, अन्यायपूर्ण है, धिक्कार योग्य है उसको धर्म के नाम पर सही ठहराया जाता है। जहाँ सत्य की जगह बेशर्मी से शस्त्र कहा जाता है।

    ये संत नही अपराधी हैं। कुंभनदास ने लिखा था – संतन को कहाँ सीकरी से काम – और ये हैं कि सत्ता की चाकरी को धर्म कह रहे हैं।

    बच बचा के कहने का वक़्त गया। कहना होगा तुलसी के शब्दों में ही कि ये सब “धींग धरमध्वज धंधक धोरी” हैं।

    Disclaimer: Ashok Kumar Pandey authored books Kashmirnama, Kashmir & Kashmiri Pandits, Usne Gandhi Ko Kyon Mara. His Twitter handle is @Ashok_Kashmir, this opinion views are his personal.

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