Sunday, October 2, 2022
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    नाम बदलकर मेटा करने से कोई फ़ायदा नहीं, जकरबर्ग ये ग़लतियाँ न करते तो फ़ेसबुक के 1 मिलियन यूज़र्स न घटते

    ऐसा लगता है कि लोगों का मोह अब फ़ेसबुक से घटता जा रहा है। फ़ेसबुक के डेली यूजर्स में पहली बार 10 लाख से ज्यादा की गिरावट आई है। यह आंकड़ा फेसबुक की पैरंट कंपनी मेटा ने अक्टूबर-दिसंबर तिमाही की रिपोर्ट में बताया है। पिछले साल कई विवादों से घिरने के बाद अक्टूबर में फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कंपनी का नाम बदलकर मेटा रख दिया था। लेकिन नाम बदलने से कुछ ख़ास असर देखने को नहीं मिला। इतना ही नहीं, फेसबुक की मूल कंपनी मेटा को गुरुवार को मूल्य 232 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। यह अमेरिकी शेयर बाजार के इतिहास में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट है

    फेसबुक पर लगातार लोगों की प्राइवेसी चुराने और फेक न्यूज़ फैलाने का आरोप लगता रहा है। एक्सपर्ट की मानें तो मार्केट में नए कंपीटीटर, फेक न्यूज़ और प्राइवेसी का मसला अब मार्क जकरबर्ग पर भारी पड़ने लगा है।

    फेसबुक यूजर होने के नाते आप ने भी कई दफा नोटिस किया होगा कि अब फ़ेसबुक झूठ का अड्डा बनते जा रहा है। यह प्लेटफार्म लोगों के डाटा की चोरी कर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है। कई दफा आपने देखा होगा कि फेसबुक पर फेक न्यूज़ वायरल होने के कारण दो समुदायों के बीच टकराव देखने को मिलती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि जिस ऐप पर आप घंटो बिताते हैं वह प्लेटफार्म ह्यूमन ट्रैफिकिंग को भी बढ़ावा देता है।
    आज की इस आर्टिकल में आपको बताएंगे कि कैसे फेसबुक ने अपने फायदे के लिए आपके डेटा की चोरी करता है।

    1. फेसबुक या फिर फेकबुक?

    फेसबुक को अगर “फेकबुक” कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। विदेशी मीडिया और प्रमुख समाचार एजेंसियों ने फेसबुक की आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार बताया कि भारत में फेसबुक अब फेकबुक की शक्ल लेता जा रहा है। इसमें बताया गया कि फेसबुक भारत में फर्जी अकाउंट से झूठी खबरों के जरिए चुनावों को प्रभावित करती है। चुनाव आते ही फेसबुक किसी खास पार्टी की तरफ झुक जाती है। चुनाव से कुछ समय पहले ही फेसबुक एक नैरेटिव सेट करने लग जाता है।लाखों फेक अकाउंट बन जाते हैं और यह फेक अकाउंट किसी खास पार्टी, खास इंसान के समर्थन और खिलाफ़ में एजेंडा तैयार करते हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स, सीएनएन जैसे कई विदेशी अख़बार ने बताया है कि फ़ेसबुक कैसे किसी पॉलिटिकल पार्टी को फायदा पहुंचाती है।

    सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक फेसबुक कंपनी ने भारत सहित अमेरिका, मैक्सिको,ब्राजील के चुनाव में भी किसी ख़ास पार्टी को चुनावी फायदा पहुंचाया है। चुनाव के समय फेसबुक पर खास समुदाय के प्रति नफरत बढ़ जाती है। सीएनएन भारत के पूर्व ब्यूरो प्रमुख रवि अग्रवाल के मुताबिक “सोशल मीडिया पर नैरेटिव सेट किया जाता है कि कौन ऊपर है, कौन नीचे, कौन स्मार्ट है और कौन बेवकूफ। एजेंडा सेट करने के लिए टीवी के तुलना में सोशल मीडिया का इस्तेमाल सोशल मीडिया का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।”
    व्सिलब्लोअर्स फ्रांसेस हौगेन ने दावा किया था कि फेसबुक को इस बात की सारी जानकारी है लेकिन फिर भी फ़ेसबुक
    फेकन्यूज रोकने के लिए कुछ नहीं कर रहा है।

    2.कोरोना वैक्सीन जुड़े ग़लत पोस्ट वायरल

    फेसबुक से जुड़ी एक नई रिसर्च में पिछले साल कहा गया था कि कंपनी ने कोरोना महामारी और वैक्सीनेशन से जुड़ी कई फेक प्रोफाइल को फेसबुक और इंस्टाग्राम पर प्रमोट किया। पिछले साल इन प्रोफाइल के 3,70,000 फॉलोअर्स बन गए।
    फेसबुक से जुड़ी इस रिसर्च को न्यूजगार्ड ने किया है। ये ऐसा ऑर्गनाइजेशन है, जो इंटरनेट पर आने वाले फेक न्यूज, हेट स्पीच, भड़काऊ कंटेंट पर नजर रखता है। ये 20 अकाउंट, पेज और ग्रुप को ट्रैक कर रहा था।

    1. दुनियाभर में नफरत फैलाने का आरोप लगा

    म्यांमार नरसंहार के लिए रोहिंग्याओं ने कंपनी पर हेट स्पीच का आरोप लगाते हुए 11 लाख करोड़ का केस किया था।इसके साथ ही अमेरिकी संसद पर हमले की घटना में भी फेसबुक पर नफरत फैलाने का आरोप लगा था।

    1. कैम्ब्रिज एनालिटिका के जरिए फ़ेसबुक यूजर्स की डेटा चोरी करना

    राजनीतिक पार्टियों को सलाह देने वाली कैम्ब्रिज एनालिटिका पर 2018 में करीब 8.7 करोड़ फेसबुक यूजर के डेटा चोरी का आरोप लगा था। कंपनी पर आरोप लगा कि उसने फेसबुक से चुराए डेटा का इस्तेमाल 2016 में हुए अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया था। फ़ेसबुक ने यह डेटा एक क्विज ऐप के जरिए हासिल किया गया था। जिसमें यूजर्स को कुछ सवालों के जवाब देने थे। यह क्विज इस तरह के बनाया गया था कि इसमें हिस्सा लेने वाले न सिर्फ यूजर्स का डेटा के साथ साथ उनसे जुड़े उनके दोस्तों का भी डेटा इकट्ठा कर लेता था। कैम्ब्रिज एनालिटिका स्कैंडल सामने आने के बाद फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने स्वीकार किया था कि उनकी कंपनी से गलतियां हुई हैं। जिससे 8.7 करोड़ यूजर्स का डेटा गलत तरीके से कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ साझा किया गया था।

    1. कंपनी के ट्रेड टूल से ह्यूमन ट्रैफिकिंग का बिजनेस

    फेसबुक की पूर्व डेटा एनालिस्ट और व्हिसलब्लोअर फ्रांसेस हौगेन ने पिछले साल फेसबुक से जुड़ी कंट्रोवर्सी को लेकर कई बड़े खुलासे किए थे। उन्होंने बताया था कि कैसे फ़ेसबुक ट्रेड टूल से ह्यूमन ट्रैफिकिंग का बिजनेस चलाता है। उन्होंने कहा था कि आप आज भी फेसबुक पर अरबी में ‘खादीमा’ या ‘मेड्स’ सर्च करते हैं तो अफ्रीकियों और दक्षिण एशियाई महिलाओं की उम्र और उनकी फोटोज कीमत के साथ लिस्टेड रहती हैं। इन्हें कोई भी यूजर्स अपने पसंद के हिसाब से हायर कर सकता है।

    यह पढ़ने के बाद जब हमने फ़ेसबुक पर “खादिमा” नाम से सर्च किया तो हमें बुर्के में सड़कों पर बैठी कुछ महिला दिखी जिनकी फ़ोटो कीमत के साथ लिस्टेड थी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि फेसबुक के प्रोडक्ट बच्चों के लिए नुकसानदेह होते हैं। ये विभाजन को बढ़ावा देते हैं और लोकतंत्र को खतरे में डालते हैं।

    आसान भाषा में कहे तो फ़ेसबुक हमें अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ भड़का रहा है। फ़ेसबुक 2 समुदायों के बीच नफ़रत फैलाता है। पिछले चुनाव में पीएम मोदी पर आरोप भी लगा था कि फ़ेसबुक उन्हें चुनावी फायदा पहुंचा रहा है। भड़काऊ और नफरती पोस्ट, ना रोकना फ़ेसबुक के पतन का कारण बनता जा रहा है।

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    Shruti Bhardwaj
    Journalist, who loves to write only Political news. Love Satire. Keen Observer and a good orator.

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