Wednesday, November 30, 2022
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    देश में धार्मिक स्वतंत्रता है तो हिजाब पर विवाद क्यों? समझे क्या कहता है देश का संविधान।

    पिछले महीने कर्नाटक के उडुपी जिले में एक कॉलेज में हिजाब पहनने के लिए छह छात्रों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने के बाद , यह विवाद राज्य के अन्य कॉलेजों में फैल गया है कि क्या शैक्षणिक संस्थान एक सख्त ड्रेस कोड लागू कर सकते हैं जो छात्रों के अधिकारों में हस्तक्षेप कर सकता है। इस मुद्दे के बाद से आम लोगों के मन में एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या हिजाब ना पहनने देना लड़कियों के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

    संविधान का अनुच्छेद 25 (1) – लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्नय तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक है। यानी यह कानून है इजाजत देता है कि देश में रह रहे हर व्यक्ति को अपने धर्म को मानने का पूरा अधिकार है और साथ ही राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि इस स्वतंत्रता का प्रयोग करने में कोई हस्तक्षेप या बाधा नहीं है। हालांकि, सभी मौलिक अधिकारों की तरह, राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य राज्य हितों के आधार पर अधिकार को प्रतिबंधित कर सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्धारित करने के लिए एक व्यावहारिक परीक्षण विकसित किया है कि किन धार्मिक प्रथाओं को संवैधानिक रूप से संरक्षित किया जा सकता है और क्या अनदेखा किया जा सकता है। 1954 में, सुप्रीम कोर्ट ने शिरूर मठ मामले में कहा कि “धर्म” शब्द में एक धर्म के लिए “अभिन्न (integral)” सभी अनुष्ठानों और प्रथाओं को शामिल किया जाएगा। अभिन्न क्या है यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण को “आवश्यक धार्मिक प्रथाओं” परीक्षण कहा जाता है।

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    “सबसे पहले यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि ऐसे कौन से रिवाज है जो किसी भी धर्म के संदर्भ में बेहद जरूरी है।” लेकिन कई बार कानून व्यवस्था से जुड़े बड़े लोग आवश्यक धार्मिक रिवाज परीक्षण के खिलाफ रहते हैं क्योंकि इसके लिए कोर्ट को धार्मिक संगठनों के भावना और प्रथाओं की तह तक जाना पड़ता है।

    कानूनी जानकारों का कहना है कि, इसका कानून का काम धार्मिक स्वतंत्रता का संरक्षण करना है ना कि यह पता करना कि किस धर्म के लिए क्या पास जरूरी है और क्या नहीं। कई मामलों में, अदालत ने कुछ रिवाजों को बाहर रखने के लिए कानून लागू किया है। 2004 के एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आनंद मार्ग संप्रदाय को सार्वजनिक सड़कों पर तांडव नृत्य करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं था, क्योंकि यह संप्रदाय की एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं थी।

    ऐसे ही एक बार 2016 में, सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की बेंच ने दाढ़ी रखने के लिए भारतीय वायु सेना से एक मुस्लिम एयरमैन की छुट्टी को बरकरार रखा। जस्टिस टीएस ठाकुर, डी वाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव ने एक मुस्लिम एयरमैन के मामले को सिखों से अलग किया, जिन्हें दाढ़ी रखने की अनुमति है।

    सशस्त्र बल विनियम, 1964 का विनियम 425, सशस्त्र बलों के कर्मियों द्वारा लंबे बाल रखना और बाल बढ़ाने को प्रतिबंधित करता है, सिवाय “उन कर्मियों के जिनके धर्म पर बाल काटने या चेहरे को शेव करने पर रोक लगाता है”। अदालत ने अनिवार्य रूप से माना कि दाढ़ी रखना इस्लामी प्रथाओं का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

    अदालत ने शिरूर मठ मामले में आवश्यक धार्मिक प्रथाओं की जांच नहीं की, लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद के एक इनपुट का संदर्भ दिया।

    “सुनवाई के दौरान, हमने श्री सलमान खुर्शीद, अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील से पूछताछ की थी कि क्या इस्लाम में एक विशिष्ट आदेश है जो ‘बालों को काटने या चेहरे के बाल काटने पर रोक लगाता है’। इस केस की सुनवाई के वक्त कोर्ट ने फैसला लिया था कि दिल करता ऐसा कोई भी सबूत देने में नाकामयाब है जो यह साबित करें कि दाढ़ी ना कटवाना उनके धर्म का एक अभिन्न अंग है। के कारण कोर्ट ने फैसला लिया था कि उन्हें ससस्त्र बल नियम का ही पालन करना होगा।
    2015 में, केरल उच्च न्यायालय के समक्ष कम से कम दो याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसमें अखिल भारतीय प्री-मेडिकल प्रवेश के लिए ड्रेस कोड के तरीकों को चुनौती दी गई थी, जिसमें “आधी बाजू वाले हल्के कपड़े, जिसमें बड़े बटन, ब्रोच / बैज, फूल आदि नहीं हो” पहनने का प्रावधान था। सलवार सूट पहनने का ड्रेस कोड था साथ ही जूतों की बजाय चप्पल पहनने के लिए कहा गया था।

    केंद्रीय स्कूल शिक्षा बोर्ड (CBSE) के तर्क को स्वीकार करते हुए यह माना था कि नियम केवल यह सुनिश्चित करने के लिए था कि उम्मीदवार कपड़ों के पागल अंदर ना ले जा सके साथी परीक्षाओं के प्रकार की कोई दिक्कत ना हो , केरल एचसी ने सीबीएसई को उन छात्रों कड़ी तौर पर जांच के आदेश दिए थे जो धर्म के रिवाजों के नाम पर ड्रेस कोड के खिलाफ जाकर कपड़े पहन कर आए थे।

    केस में जस्टिस विनोद चंद्र ने यह फैसला सुनाया था कि”यदि निरीक्षक को सिर पर दुपट्टा या पूरी बांह के कपड़ों को हटाने और जांच करने की आवश्यकता होती है, तो याचिकाकर्ता भी अधिकृत व्यक्ति द्वारा खुद को इसके अधीन करेंगे। यह भी वांछनीय है कि सीबीएसई अपने पर्यवेक्षकों को यह सुनिश्चित करने के लिए सामान्य निर्देश जारी करे कि धार्मिक भावनाएं आहत न हों और साथ ही अनुशासन से समझौता न किया जाए, ”

    वही दूसरा मामला आमना बिंट बशीर बनाम केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (2016) में, केरल एचसी ने इस मुद्दे की अधिक बारीकी से जांच की। न्यायमूर्ति पीबी सुरेश कुमार, जिन्होंने छात्र की याचिका की अनुमति दी, ने कहा कि हिजाब पहनने की रिवाज़ एक आवश्यक धार्मिक रिवाज़ है, लेकिन सीबीएसई नियम को रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने एक बार फिर “अलग से जांच” और पिछले वर्ष लगाए गए सुरक्षा उपायों की अनुमति दी।

    हालांकि, एक स्कूल द्वारा निर्धारित वर्दी के मुद्दे पर, एक और बेंच ने फातिमा तसनीम बनाम केरल राज्य (2018) में अलग तरीके से फैसला सुनाया। केरल उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने कहा कि किसी संस्था के सामूहिक अधिकारों को याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत अधिकारों पर प्राथमिकता दी जाएगी। इस मामले में 12 और 8 साल की दो लड़कियां शामिल थीं, जिनका प्रतिनिधित्व उनके पिता ने किया था, जो चाहते थे कि उनकी बेटियां सिर पर स्कार्फ और पूरी बाजू की शर्ट पहनें। जिस स्कूल ने हेडस्कार्फ़ की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
    न्यायमूर्ति मोहम्मद मुस्ताक ने कहा, “याचिकाकर्ता संस्था के व्यापक अधिकार के खिलाफ अपने व्यक्तिगत अधिकार को लागू करने की मांग नहीं कर सकते।”

    पिता ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में अपील की थी। न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपीलों को खारिज कर दिया क्योंकि यह कहा गया था कि अपीलकर्ता-याचिकाकर्ता अब स्कूल नहीं जा रहे हैं ।

    उडुपी कॉलेज की इन छात्राओं ने भी अपना मामला अब कोर्ट के हवाले कर दिया है। छात्राओं ने इसे अपने संवैधानिक और मौलिक अधिकारों की लड़ाई बताते हुए कोर्ट से इस पर कार्रवाई की मांग की है।

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    Tannu Rai
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