Wednesday, November 30, 2022
More

    दलितों को अस्पतालों में दाख़िला तक नहीं मिल रहा, डिलीवरी तक खुद करने को मजबूर!

     discrimination of marginalised communities affects their access to healthcare.

    वाराणसी, उत्तर प्रदेश: जहां एक तरफ मुख्यमंत्री आदित्य योगी नाथ उत्तर प्रदेश को एक मेडिकल हब बनाने का दावा कर रहे हैं वहीं दूसरी और उत्तर प्रदेश के ऐसे कई जिले हैं जहां दलित लोग आम स्वास्थ सुविधाओं के लिए भी तरस रहे हैं। जहां सिर्फ उनकी जाति के कारण उन्हें आम स्वास्थ सुविधाएं भी नहीं मिलती है। जहां केवल मां-बाप की जाति के कारण रोज न जाने कितनी नवजातों की प्रसव के दौरान सही सुविधा न मिलने पर मृत्यु हो जाती है। अस्पतालों में दलितों के साथ हो रहे भेदभाव के कारण हालात ऐसे हैं कि इन परिवारों में चाहे कितने भी बड़े कॉम्प्लिकेशंस क्यों ना हो जाए, उसका इलाज ये घर पर ही करने की कोशिश करते हैं।

    ऐसी घटना का जिक्र उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में, हाशिए पर रहने वाली लक्ष्मी देवी ने पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया'(PARI) के रिपोर्टर पार्थ एमएम से बातचीत के दौरान बताया। लक्ष्मी बताती है कि उन्हें ठीक से तो याद नहीं लेकिन दिसंबर या जनवरी की ठंड की रात थी, जमुना अचानक से प्रसव पीड़ा शुरू हुई। उसके परिवार ने उसे बड़ागांव प्रखंड के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाने के लिए एक टेंपो किराए पर लिया था। पीएचसी उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में उनके गांव अश्वरी से लगभग छह किलोमीटर दूर है।

    30 साल की लक्ष्मी याद करती हैं, “जब हम पीएचसी पहुंचे तो मुझे बहुत दर्द हो रहा था। लेकिन अस्पताल के वस्टाफ ने मुझे भर्ती करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि मैं गर्भवती नहीं थी, और मेरा पेट किसी बीमारी बीमारी के कारण फुला हुआ था।” परिवार के लोगों ने बहुत बार हॉस्पिटल स्टाफ से भर्ती करने को कहा लेकिन लोगों ने मना कर दिया।

    लक्ष्मी में कहीं और जाने की ताकत नहीं बची थी इसीलिए उसकी सास हीरामानी ने वही हॉस्पिटल के सामने पेड़ के नीचे उनके बच्चे के डिलीवरी कराई। सही सुविधा ना मिलने के कारण बच्चा बच ना सका। बच्चे के खोने का दर्द समझने के लिए भी वह बहुत कमजोर और थकी हुईं थीं। लक्ष्मी बताती हैं “उसके बाद पीएचसी स्टाफ ने मुझे अंदर ले लिया, और अगले दिन मुझे छुट्टी दे दी।” “अगर उन्होंने जरूरत पड़ने पर ध्यान दिया होता, तो मेरा बच्चा जीवित रहता।”

    लक्ष्मी मुसहर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक हाशिए पर रहने वाले और सबसे गरीब दलित समूहों में से एक, मुसहरों को गंभीर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। “जब हम जैसे लोग अस्पतालों में जाते हैं, तो हमारे साथ कभी अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता है। “

    हैरानी की बात यह है कि उस पूरे इलाके में लक्ष्मी अकेली ऐसी नहीं है जिन्हें दलित और भेदभाव के कारण नहीं लगना मिलाओ बल्कि पूरे इलाके में ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्हें अस्पतालों में भेदभाव का सामना करना पड़ा है।

    इस बारे में वाराणसी स्थित पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स से जुड़ी कार्यकर्ता मंगला राजभर कहती हैं, “हॉस्पिटलों में दलित महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव के कारण यह महिलाएं अपने बच्चों को घर पर ही जन्म देना पर पसंद करती है। यह महिलाएं हॉस्पिटल जाने के लिए राजी ही नहीं होती।”

    राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार , उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति की लगभग 81 प्रतिशत महिलाएं स्वास्थ्य सुविधा में जन्म देने का विकल्प चुनती हैं जो कि राज्य के आंकड़े से 2.4 प्रतिशत कम। यही शायद अनुसूचित जातियों में नवजात मृत्यु दर बढ़ने का सबसे बड़ा कारण है । जन्म के पहले 28 दिनों के दौरान मृत्यु की संख्या – जो पूरे राज्य (35.7) की तुलना में अनुसूचित जातियों (41.6) में अधिक है।

    जनवरी 2022 में राजभर द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में, बड़ागांव ब्लॉक की सात मुसहर बस्तियों में हाल ही में हुए 64 बच्चों में से 35 घर में जन्म के थे।

    वही नवंबर 2021 में ऑक्सफैम इंडिया की मरीजों के अधिकार पर किए गए सर्वे की रिपोर्ट यह बताती है कि उत्तर प्रदेश के 472 लोगों में से 52.44 प्रतिशत लोगों ने आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव महसूस किया। लगभग 14.34 प्रतिशत ने अपने धर्म के कारण और 18.68 प्रतिशत ने जाति के आधार पर भेदभाव महसूस किया।

    यहां पर रहने वाले दलित परिवारों के साथ कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान भी भेदभाव किया गया। इस भेदभाव के कारण तो कई लोगों ने कोरोना वायरस का टेस्ट करवाया और अगर वह बीमार पड़ भी गए तो घर ही पर इलाज करना बेहतर समझते थे। यहां पर रहने वाले ,का कहना है कि कोविड के दौरान एक तो वो शारीरिक रूप से अस्वस्थ थे और किसी भी वजह से वह किसी भी तरह का मानसिक दबाव झेलने के लिए तैयार नहीं थे । इसीलिए अस्पताल में होने वाले भेदभाव से बचने के लिए उन्होंने घर पर ही इलाज किया।

    कोविड महामारी के दौरान कोई भेदभाव का जिक्र करते हुए चंदौली जिले के अमधा चरणपुर गांव में, 55 वर्षीय सलीमुन ने बताया कि मार्च 2021 में जब उन्हें कई दिनों तक लगातार बहुत तेज बुखार रहा था, तो एक लैब में अपने खून की जांच करवाने गई थी । जहां केवल उनकी एक मुस्लिम होने के कारण उन्हें तबलीगी जमात से जोड़कर वहां के काम करने वाले स्टाफ ने उनके साथ भेदभाव किया था। वो उनके करीब आने में डर रहा था और उनके हाथ को ही दूर खींचकर खून जांच के लिए खून ले रहा था।

    इस तरह के पक्षपातपूर्ण व्यवहार को रोकने के लिए, 43 वर्षीय कार्यकर्ता, नीतू सिंह कहती हैं कि” मैं अपने आसपास के अस्पतालों को खुद जाकर निरीक्षण करती हूं। जैसे किसी अस्पताल के स्टाफ को या अस्पताल को यह पता चलता है कि मैं आस-पास हूं तो वहां पहुंचे सभी लोगों के साथ बिना किसी जाति धर्म के भेद किए उनका तुरंत इलाज करते हैं।” लेकिन आम दिनों में उनके साथ इतना भेदभाव होता है कि चाहे वो कितने में भी दर्द में क्यों ना हो वह घर पर ही इलाज करने की कोशिश करते हैं।

    Advertisement
    Tannu Rai
    Learning journalism, blogs are all about my opinion and perspective on different topics. Mostly write about the on going events of politics, social and entertainment industry. Blogs are in very simple language nd topics are related common people. In entertainment field, love to write about their fashion, life ,style,diets,and professional work . Also write about social issues and development of society.

    संबंधित खबरें

    Conntect with Us

    898,779FansLike
    5,352FollowersFollow
    605,819SubscribersSubscribe
    - Advertisement -